Wednesday, 6 November 2013

जीवन का सत्य

जब जीव संसार में आता है । सब बहुत खुश होते है कि हमारे आँगन
कोई आया या आई है । उस आने वाले कोई ज्ञान नही होता कि माँ कौन होती है । सब प्यार करते है कि हमारा बच्चा है । उसके बाद बच्चा संसार के मोह में फंस जाता है और संसार की दल -दल में फसता चला जाता है । जब वह बड़ा होता है संसार के मोह फस जाता है उसके बाद रिश्ते बनने शुरू हो जाते है जैसे कि माँ -पिता,दादा -दादी,चाचा -चाची,ताया -ताई ,बुआ -फुफा और नाना -नानी ,मामी -मामा आदि । स्कूल की शुरू हो जाता है उसमें मित्र मेला जुड़ जाता है    नोकरी या कारोबार शुरू , उसके बाद शादी हो जाती है उसके बच्चे हो जाते हैजीव अपना घर बन जाता है । माया मोह इतना बढ़ जाता है कि वह संसार को अपना घर समझने लग जाता है धीरे-धीरे वह मोह के तार झुटने लग जाता है जिनको अपना समझता वह उसको



सच से बड़ा कोई धन नही है| आत्मा से बड़ा कॊई सच नही, जीवन से बड़ा कोई सत्य नही| मृत्यु ही जीवन का अटल सत्य है| 

जब हम जिन्दा तो कभी मेरा ख्याल नही आया ।  अब यहाँ बैठे है आँसू बाह रहे ।। 
  जब हम जिन्दा थे कभी  पास बैठे नही    दुनियाँ को दिख-दिख कर  आसूँ   बहा रहे हो ।।       
 जब जिंदा थे कभी खाने को पूछा नही     अब अनाज को दान देकर लोगो को दिखा रहे हो । 

जब जिन्दा थे कभी पहने को पूछा नही  अब मरने के बाद क़फन उढ़ा रहे हो ।।   
  जब जिन्दा थे कभी साथ चले नही ।     मरने के बाद क्यों साथ जा रहे हो ।। 
   
                                                                                    यदि मदरडे इतना ही प्यारा है,उन माताओ का क्या जिनका घर अन्दर सम्मान नही होता । वो भी माँ जो अनाथ-आलय व वृद्धआश्रम में जीवन बिता देती है अपनी अन्तर आत्मा की आवाज सुनकर इसे लाइक करे ।