Friday, 27 September 2013

भगवान् के 108 नाम

 ॐ, कन्हैया, कृष्ण, केशव, चक्रधारी, नन्दलाल, माधो, सुन्दर-श्याम, मुरारी, राधावर, बंसीबजैया, रधुवीर, नटवर, नन्द नन्दन, गजाधर, अविनाशी, नरोतम, अर्जुनसखा, अमरअजर, सावरिया, सांवला, गोपाल, दामोदर, ब्रजनाथ, दयालु, दीनबन्धु, जगदीश, दीनानाथ, जगतपिता, नारायण, बावन, यशोदा लाल, बिहारी, मदनमोहन, कृपानिधान, सर्वरक्षक, ईश्वर, सर्वशक्तिमान, मनहरण, सर्व व्यापक, बाँके बिहारी, गोपीनाथ, ब्रजवल्लभ, गोवर्धन धारी, घनश्याम, परमानन्द, पतितपावन, ज्योतिस्वरूप, राधारमण, माधव, मधुसूधन, रघुपति, राम, हरि, कल्याणकारी, मुरलीमनोहर, श्यामा, अनन्त, परमपिता, प्रभु, परमपवित्र, गोसाई, भक्तवत्सल, वासुदेव, परमपिता, प्रभु, परमपवित्र, गोसाई, भक्तवत्सल, वसुदेव, परमात्मा, विधाता, दुःखहरता, निरंजन, कालीनाग नथिया, अभै, अन्तर्यामी, सर्वाधार, अद्वैत, घटघट के वासी, दाता, दीनानाथ,  परमेश्वर,रमणीक,  निराकार,निर्विकार, अच्युत, न्यायकारी, जगत्कर्ता, त्रिभुवननाथ,  शंकर, विष्णु, सत्यनारायण, अंतरयामी, परमपिता, ब्रह्म, संहरता, पालनकर्ता, गोपी वल्लभ,  सात्विक, आनंदस्वरूपा, स्वामी, राधेश्याम, सत्यस्वरूप, आनंद दाता, कृपालु, अनदि, विश्वकर्ता, पूर्ण परमानन्द, नन्द किशोर, सुखदाता, नर  नारायण,  श्री, महेश। 

Thursday, 26 September 2013

प्रतिकूलता में विशेष भग्वनक्रिपा

मनुष्य अनुकूलता को तो चाहता है,पर प्रतिकूलता को नहीं चाहता -यह उसकी कायरता है। अनुकूलता को चाहना ही खास बन्धन है। इसके सिवाय और  कोई  बन्धन नहीं है। इस चाहना को मिटाने के  लिये  ही भगवान  बहुत प्यार से  उसके  हित के लिये  प्रतिकूलता  भेजते  हैं। प्रतिकूलता में  विजातीय  वस्तु  (संसार) - से हमारा  सम्बन्ध  छूटता  है। यदि  जीवन में प्रतिकूलता  आये  तो  समझाना चाहिये   कि  मेरे  ऊपर  भगवान की  बहुत अधिक, दुनिया से  निराली  कृपा  हो  गयी  है। प्रतिकूलता में कितना आनंद, शान्ति, प्रसन्नता है, क्या बताऊँ? प्रतिकूलता की प्राप्ति मानो साक्षात परमात्मा की प्राप्ति है। भगवान् ने कहा है - 'नित्यं च समचित्तत्वमिष्टानिष्टोपपत्तिषु'

Wednesday, 25 September 2013

अन्तकालीन चिंतन के अनुसार गति

अन्तकालीन चिन्तन और उसके 
अनुसार गतिको  समझने के  लिये एक  उदहारण दिया है। एक आदमी चित्र खिंचवाने के लिये बैठा  है। फोटो-ग्राफारने उससे कहा कि ठीक तरह से बैठना, फोटो खिंचते समय कोई अंग न हिले। ज्यों ही चित्र खिंचने  का समय आया, त्यों ही उस आदमी की नाक पर मक्खी बैठ गई। अब यदि हिल जाऊँगा तो चित्र बिगड़ जायेगा - ऐसा विचार करके उसने मक्खी को हटाने के लिये नाक को सिकोडा। इतने में ही उसका चित्र खिंच गया। जब चित्र की धुलाई के बाद उसने देखा तो चित्र बिगड़ा हुआ मिला। चित्र देख कर वह बहुत नाराज़ हुआ और बोला कि तुमने मेरा चित्र बिगाड़ दिया है। फोटो ग्राफर ने कहा कि इसमें मेरी क्या गलती है, चित्र खिंचते समय तुमने जैसी शक्ल  बनायी थी, वैसी ही चित्र में आ गयी। अब इस चित्र में कोई भी परिवर्तन नहीं हो सकता।  इसी तरह मृत्यु के समय मनुष्य के भीतर जैसा चिन्तन होगा, उसके अनुसार उसको योनि प्राप्त होगी। चित्र तो दूसरा खींचा जा सकता है परन्तु योनि दूसरी नहीं बदली जा सकती। इसलिए मनुष्य को हर समय सावधान रहने की आवश्यकता है। मृत्यु के समय का कोई पता नहीं, न जाने कब आभगवान्  जाए। इसलिए कोई खराब चिंतन आ जाए तो सावधान हो जाएं की यदि इस समय मृत्यु हो जाती तो क्या गति होती? भगवान् कहते हैं - 'तस्मात्सर्वेषु कालेषु मामनुस्मर'

अन्तकाल में जैसा चिंतन होता है, वैसी ही गति होती है, पर अन्तकाल का पता नहीं कि कब आ जाए। अगर सब समय में प्रभु का स्मरण होता रहे तो मृत्यु कभी भी आ जाए, कोई चिंता नहीं है; क्योंकि अब कोई खतरा नहीं रहा। 

Sunday, 22 September 2013

अनमोल वचन

श्री कृष्ण जी कहते हैं:
जिसने मन को जीत लिया है उसके लिए मन सर्वश्रेष्ठ मित्र है, किन्तु जो ऐसा नहीं कर पाया उसके लिए मन सबसे बड़ा शत्रु बना रहेगा। 
जो मुझे सर्वत्र देखता है और सब कुछ मुझमे देखता है उसके लिए न तो मै  कभी अदृश्य होता हू और न वह मेरे लिए अदृश्य होता है। 
अपने मन को मेरे नित्य चिंतन में लगाओ, मेरे भक्त बनो, मुझे नमस्कार करो और मेरी ही पूजा करो। इस प्रकार मुझमे पूर्णतया तल्लीन होने पर तुम निश्चित रूप से मुझको प्राप्त होगे।  
तुम जो कुछ करते हो, जो कुछ खाते हो, जो कुछ अर्पित करते हो या दान देते हो और जो भी तपस्या करते हो, उसे मुझे अर्पित करते हुए करो। 

निश्चय करो

निश्चय करो-मेरे मन में सदा-सर्वदा मंगलमय भगवन निवास करते हैं। उनके समस्त दिव्य गुण और भाव मेरे मन में सदा तरंगित हो रहे हैं। अब मैं मन में उनके सिवा किसी भी अन्य वास्तु को तथा किसी भी बुरे विचार और भाव को नहीं आने दूंगा।

निश्चय करो - मई सर्वत्र भगवन और उनके मंगलमय भावों को देखूंगा तथा सदा सद्विचार करूँगा। मेरे मुख से सदा भगवन की महिमा को  बताने वाले, सबका हित करनेवाले, सबको सुख पहुँचाने वाले सत्य, मधुर और पवित्र वचन ही निकलेंगे। 


निश्चय करो- मेरा कभी कोई अमगल नहीं हो सकता; मेरा  कभी  कोई  बुरा नही  कर सकता; क्यों कि  सभी  में  सभी समय  मेरे  भगवान ही निवास  करते  हें  और  मेरे  लिये  जो  कुछ  भी, जिस  किसी  के  द्वारा  भी होता  हें, सब  भगवान  के  मंगलमय  विधान से  मेरे मंगल  के  लिए ही  होता  है। 


निश्चय करो - मै कभी कोई ऐसा  करूँगा, जो श्रीभगवान की प्रसन्नता का कारण न हो। सदा उनकी सेवा के लिए ही उनके प्रीतिकर कर्म करूँगा। मेरी इच्छा सदा उन्ही कर्मों के करने की होगी, जिनसे भगवन और उन्ही के अभिव्यक्त रूप जगत के प्राणियों को सुख होता हो। 


निश्चय करो - मुझे कभी भी सद्विचार तथा सत्कर्म को छोड़कर अन्य किसी भी विचार तथा कर्म के लिए अवकाश ही नहीं मिलेगा। मन तथा शरीर नित्य  भगवान् की सेवा में ही लगे रहेंगे। एक क्षण का भी सेवा-वियोग मुझे सेहन नहीं होगा। 

निश्चय करो - संसार में मुझे कोई भी मनुष्य या घटना कभी भी उदास नहीं कर सकती; क्योंकि मेरे परम सुहृद भगवान् नित्य स्वाभाविक ही मेरा मंगल करते रहते हैं और जब सर्वशक्तिमान, सर्वत्र विराजमान मेरे प्रभु मेरे मंगल-विवान में संलग्न हैं, तब सफलता में संदेह को स्थान ही कहाँ है, जिससे निराशा और उदासी की सम्भावना हो। 

निश्चय करो - जब भगवान् के मंगलमय राज्य में अमंगल को स्थान ही नहीं है, तब अमंगल की कल्पना करके मैं क्यों व्यर्थ ही अमंगल को बुलाऊं?

निश्चय करो - जब सभी में मेरे भगवान् भरे हैं, तब सभी मंगल से ही ओतप्रोत हैं। फिर मैं किसी में अमंगल के दर्शन करके इस सत्य का हनन क्यों करूँ?

निश्चय करो - जब सर्वत्र और सदा मंगल-ही-मंगल और आनंद-ही-आनंद है, तब मैं सदा आनंद में ही निमग्न रहूँगा। जीवन-मृत्यु, लाभ-हानि, सुख-दुःख, मान- अपमान,स्तुति-निंदा - किसी भी बाहरी अवस्था का मेरी इस नित्य आनंदमयी स्तिथि पर कोई प्रभाव नहीं पद सकेगा।

याद रखो - यहाँ जो तुम्हे दोष, दुःख, अमंगल तथा अशुभ दीखता है, वह इसीलिए दीखता है की तुम सदा सर्वत्र नित्य मंगलमय और आनंदमय भगवान् को नहीं देख पा रहे हो। यहाँ जो कुछ ऊपर से दीखते हैं, वे उन मंगलमय भगवान् के ही विभिन्न छद्वेद हैं। उन्ही की लीला के विविध दृश्य हैं। इनकी आड़ में नित्यानंद-धन्स्वरूप भगवान् सदा विराजमान हैं। 

याद रखो- तुम अशुभ की कल्पना करते हो, इसीसे तुम्हे दुःख होता है। किसी भी अशुभ-से-अशुभ कहे और माने जाने वाले पदार्थ और भाव में भी गहराई से देखोगे तो तुम्हे परम शुभ और परम सुखरूप भगवन छिपे दिखाई देंगे। जहाँ जाओ, जहाँ देखो, उन्हें ही देखने का प्रयत्न करो। अपनी तीक्ष्ण दृष्टि उन्ही का अनुसन्धान करो। उन्हें पहचान लो और निहाल हो जाओ।   

Saturday, 21 September 2013

Khand from padam puraan- hamara kartavya

नाथ! पुत्र, मित्र, गृह आदि से घिरे हुए संसार-सागर से आप ही मेरी रक्षा करते हैं। आप ही शरणागत जनों का भय भंजन करते हैं। यह मैं, मेरा यह देह और इहलोक-परलोक में जो कुछ भी मेरा है, आज वह सब मैं आपके श्री चरणों में समर्पण करता हूँ। मैं अपराधों का घर हूँ। मेरे अन्य कोई साधन नहीं हैं, मेरी कोई गति नहीं है। नाथ! आप ही मेरी गति हैं। श्रीराधिकरमण! श्रीक्रिशंकानते! मैं तन-मन-वचन से आपका ही हूँ, आप युगल-सरकार ही मेरी अनन्य गति हैं। मैं आपके शरण हूँ, आपके शरणों में पड़ा हूँ, आप करुणा की खान हैं। मुझ दुष्ट अपराधी पर कृपा करके मुझे अपना दास बना लीजिये|