Thursday, 26 September 2013

प्रतिकूलता में विशेष भग्वनक्रिपा

मनुष्य अनुकूलता को तो चाहता है,पर प्रतिकूलता को नहीं चाहता -यह उसकी कायरता है। अनुकूलता को चाहना ही खास बन्धन है। इसके सिवाय और  कोई  बन्धन नहीं है। इस चाहना को मिटाने के  लिये  ही भगवान  बहुत प्यार से  उसके  हित के लिये  प्रतिकूलता  भेजते  हैं। प्रतिकूलता में  विजातीय  वस्तु  (संसार) - से हमारा  सम्बन्ध  छूटता  है। यदि  जीवन में प्रतिकूलता  आये  तो  समझाना चाहिये   कि  मेरे  ऊपर  भगवान की  बहुत अधिक, दुनिया से  निराली  कृपा  हो  गयी  है। प्रतिकूलता में कितना आनंद, शान्ति, प्रसन्नता है, क्या बताऊँ? प्रतिकूलता की प्राप्ति मानो साक्षात परमात्मा की प्राप्ति है। भगवान् ने कहा है - 'नित्यं च समचित्तत्वमिष्टानिष्टोपपत्तिषु'

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