अन्तकालीन चिन्तन और उसके
अनुसार गतिको समझने के लिये एक उदहारण दिया है। एक आदमी चित्र खिंचवाने के लिये बैठा है। फोटो-ग्राफारने उससे कहा कि ठीक तरह से बैठना, फोटो खिंचते समय कोई अंग न हिले। ज्यों ही चित्र खिंचने का समय आया, त्यों ही उस आदमी की नाक पर मक्खी बैठ गई। अब यदि हिल जाऊँगा तो चित्र बिगड़ जायेगा - ऐसा विचार करके उसने मक्खी को हटाने के लिये नाक को सिकोडा। इतने में ही उसका चित्र खिंच गया। जब चित्र की धुलाई के बाद उसने देखा तो चित्र बिगड़ा हुआ मिला। चित्र देख कर वह बहुत नाराज़ हुआ और बोला कि तुमने मेरा चित्र बिगाड़ दिया है। फोटो ग्राफर ने कहा कि इसमें मेरी क्या गलती है, चित्र खिंचते समय तुमने जैसी शक्ल बनायी थी, वैसी ही चित्र में आ गयी। अब इस चित्र में कोई भी परिवर्तन नहीं हो सकता। इसी तरह मृत्यु के समय मनुष्य के भीतर जैसा चिन्तन होगा, उसके अनुसार उसको योनि प्राप्त होगी। चित्र तो दूसरा खींचा जा सकता है परन्तु योनि दूसरी नहीं बदली जा सकती। इसलिए मनुष्य को हर समय सावधान रहने की आवश्यकता है। मृत्यु के समय का कोई पता नहीं, न जाने कब आभगवान् जाए। इसलिए कोई खराब चिंतन आ जाए तो सावधान हो जाएं की यदि इस समय मृत्यु हो जाती तो क्या गति होती? भगवान् कहते हैं - 'तस्मात्सर्वेषु कालेषु मामनुस्मर'
अन्तकाल में जैसा चिंतन होता है, वैसी ही गति होती है, पर अन्तकाल का पता नहीं कि कब आ जाए। अगर सब समय में प्रभु का स्मरण होता रहे तो मृत्यु कभी भी आ जाए, कोई चिंता नहीं है; क्योंकि अब कोई खतरा नहीं रहा।
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