Sunday, 22 September 2013

निश्चय करो

निश्चय करो-मेरे मन में सदा-सर्वदा मंगलमय भगवन निवास करते हैं। उनके समस्त दिव्य गुण और भाव मेरे मन में सदा तरंगित हो रहे हैं। अब मैं मन में उनके सिवा किसी भी अन्य वास्तु को तथा किसी भी बुरे विचार और भाव को नहीं आने दूंगा।

निश्चय करो - मई सर्वत्र भगवन और उनके मंगलमय भावों को देखूंगा तथा सदा सद्विचार करूँगा। मेरे मुख से सदा भगवन की महिमा को  बताने वाले, सबका हित करनेवाले, सबको सुख पहुँचाने वाले सत्य, मधुर और पवित्र वचन ही निकलेंगे। 


निश्चय करो- मेरा कभी कोई अमगल नहीं हो सकता; मेरा  कभी  कोई  बुरा नही  कर सकता; क्यों कि  सभी  में  सभी समय  मेरे  भगवान ही निवास  करते  हें  और  मेरे  लिये  जो  कुछ  भी, जिस  किसी  के  द्वारा  भी होता  हें, सब  भगवान  के  मंगलमय  विधान से  मेरे मंगल  के  लिए ही  होता  है। 


निश्चय करो - मै कभी कोई ऐसा  करूँगा, जो श्रीभगवान की प्रसन्नता का कारण न हो। सदा उनकी सेवा के लिए ही उनके प्रीतिकर कर्म करूँगा। मेरी इच्छा सदा उन्ही कर्मों के करने की होगी, जिनसे भगवन और उन्ही के अभिव्यक्त रूप जगत के प्राणियों को सुख होता हो। 


निश्चय करो - मुझे कभी भी सद्विचार तथा सत्कर्म को छोड़कर अन्य किसी भी विचार तथा कर्म के लिए अवकाश ही नहीं मिलेगा। मन तथा शरीर नित्य  भगवान् की सेवा में ही लगे रहेंगे। एक क्षण का भी सेवा-वियोग मुझे सेहन नहीं होगा। 

निश्चय करो - संसार में मुझे कोई भी मनुष्य या घटना कभी भी उदास नहीं कर सकती; क्योंकि मेरे परम सुहृद भगवान् नित्य स्वाभाविक ही मेरा मंगल करते रहते हैं और जब सर्वशक्तिमान, सर्वत्र विराजमान मेरे प्रभु मेरे मंगल-विवान में संलग्न हैं, तब सफलता में संदेह को स्थान ही कहाँ है, जिससे निराशा और उदासी की सम्भावना हो। 

निश्चय करो - जब भगवान् के मंगलमय राज्य में अमंगल को स्थान ही नहीं है, तब अमंगल की कल्पना करके मैं क्यों व्यर्थ ही अमंगल को बुलाऊं?

निश्चय करो - जब सभी में मेरे भगवान् भरे हैं, तब सभी मंगल से ही ओतप्रोत हैं। फिर मैं किसी में अमंगल के दर्शन करके इस सत्य का हनन क्यों करूँ?

निश्चय करो - जब सर्वत्र और सदा मंगल-ही-मंगल और आनंद-ही-आनंद है, तब मैं सदा आनंद में ही निमग्न रहूँगा। जीवन-मृत्यु, लाभ-हानि, सुख-दुःख, मान- अपमान,स्तुति-निंदा - किसी भी बाहरी अवस्था का मेरी इस नित्य आनंदमयी स्तिथि पर कोई प्रभाव नहीं पद सकेगा।

याद रखो - यहाँ जो तुम्हे दोष, दुःख, अमंगल तथा अशुभ दीखता है, वह इसीलिए दीखता है की तुम सदा सर्वत्र नित्य मंगलमय और आनंदमय भगवान् को नहीं देख पा रहे हो। यहाँ जो कुछ ऊपर से दीखते हैं, वे उन मंगलमय भगवान् के ही विभिन्न छद्वेद हैं। उन्ही की लीला के विविध दृश्य हैं। इनकी आड़ में नित्यानंद-धन्स्वरूप भगवान् सदा विराजमान हैं। 

याद रखो- तुम अशुभ की कल्पना करते हो, इसीसे तुम्हे दुःख होता है। किसी भी अशुभ-से-अशुभ कहे और माने जाने वाले पदार्थ और भाव में भी गहराई से देखोगे तो तुम्हे परम शुभ और परम सुखरूप भगवन छिपे दिखाई देंगे। जहाँ जाओ, जहाँ देखो, उन्हें ही देखने का प्रयत्न करो। अपनी तीक्ष्ण दृष्टि उन्ही का अनुसन्धान करो। उन्हें पहचान लो और निहाल हो जाओ।   

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