हे अर्जुन ! जो कर्म शास्त्रविधिसे नियत किया हुआ और
कर्तापनके अभिमान से रहित,फलको न चाहनेवाले पुरुषद्रारा बिनारागद्देषसे
किया हुआ है वह सात्तिवक कर्म है जो कर्ता आसक्ति से रहित और अहंकार के वचन
न बोलने वाला,धैर्य और उत्साह से युक्त कार्यके सिद्द होने और न होने में ।
अच्छा बोओगे अच्छा पाओगे यदि बुरा करो तो ही होगा बुरा
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